मगध शक्तिपीठ
मगध साम्राज्य की राजधानी रही पाटलिपुत्र को वर्तमान में पटना के नाम से जाना जाता है। पाटलिपुत्र का नाम पटना क्यों पड़ा, इसके बारे में पौराणिक कथा प्रचलित है। यहां पटन देवी का पौराणिक मंदिर स्थित है। पटन देवी मंदिर देश के 51 शक्तिपीठ में से एक है। शक्तिपीठ को नगर देवी की संज्ञा भी दी जाती है। पटन देवी के नाम से ही शहर का नाम पटना पड़ा है।
पटना की बड़ी पटनेश्वरी देवी को ही शक्तिपीठ माना जाता है।
यह मंदिर पटना सिटी चौक से लगभग 5 कि.मी. पश्चिम में महाराज गंज (देवघर) में स्थित है।
यहाँ सती के “दाहिने जंघे” का पतन हुआ था।
यहाँ की सती ‘सर्वानन्दकारी’ तथा शिव ‘व्योमकेश’ हैं।
ऐसा माना जाता है कि बिहार के मुँगेर में सती के नेत्रों का पतन हुआ था, जबकि तंत्र चूड़ामणि के अनुसार नेत्रों का पतन करवीर में हुअ था।
बिहार की राजधानी पटना हावड़ा, दिल्ली रेलमार्ग पर स्थित है।
सम्राट अशोक के शासनकाल में यह मंदिर काफी छोटा था। इस मंदिर की मूर्तियां सतयुग की बताई जाती हैं। मंदिर परिसर में ही योनिकुंड है, जिसके विषय में मान्यता है कि इसमें डाली जाने वाली हवन सामग्री भूगर्भ में चली जाती है। देवी को प्रतिदिन दिन में कच्ची और रात में पक्की भोज्य सामग्री का भोग लगता है। यहां प्राचीन काल से चली आ रही बलि की परंपरा आज भी विद्यमान है।
मंदिर के पीछे एक बहुत बड़ा गड्ढा है, जिसे ‘पटनदेवी खंदा’ कहा जाता है। कहा जाता है कि यहीं से निकालकर देवी की तीन मूर्तियों को मंदिर में स्थापित किया गया था। वैसे तो यहां मां के भक्तों की प्रतिदिन भारी भीड़ लगी रहती है, लेकिन नवरात्र के प्रारंभ होते ही इस मंदिर में भक्तों का तांता लग जाता है। गुलजार बाग इलाके में स्थित बड़ी पटन देवी मंदिर परिसर में काले पत्थर की बनी महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की प्रतिमा स्थापित हैं। इसके अलावा यहां भैरव की प्रतिमा भी है।


