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श्री कन्याकुमारी शक्तिपीठ

Shri Kanyakumari Shaktipith

कन्याकुमारी शक्तिपीठ

तीन सागरों के संगम-स्थल पर स्थित कन्याकुमारी के मंदिर में ही भद्रकाली का मंदिर है। यह कुमारी देवी की सखी हैं। यह मंदिर ही शक्तिपीठ है, जहाँ देवी के देह का पृष्ठभाग का पतन हुआ था। यहाँ की शाक्ति शर्वाणि या नारायणी तथा भैरव निमिष या स्थाणु हैं। कन्याकुमारी एक अंतरीप तथा भारत की अंतिम दक्षिणी सीमा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ स्नानार्थी समस्त पापों से मुक्त हो जाता है-

ततस्तीरे समुद्रस्थ कन्यातीर्थमुपस्पृशेत्।

तत्रो पस्पृश्य राजेंद्र सर्व पापैः प्रमुच्यते॥

अन्य तीर्थ

देवी मंदिर के दक्षिण में मातृतीर्थ, पितृतीर्थ, भीमतीर्थ है। पश्चिम में थोड़ी दूर पर ही स्थाणु तीर्थ है। कन्यकाश्रम मंदिर समुद्रतट पर है। वहाँ स्नान घाट है,जहाँ गणेश जी का मंदिर है। मान्यता है कि स्नान के बाद गणेश जी का दर्शन करके तब कन्याकुमारी की भावोत्पादक एवं भव्य विग्रह के दर्शन होते हैं। मंदिर में अनेक देव विग्रह हैं। मंदिर से थोड़ी दूर पर पुष्करणी है। समुद्र तट पर एक विचित्र बावली है, जिसका जल मीठा है। इसे माण्डूक तीर्थ कहते हैं। यात्री इसमें भी स्नान करते हैं। समुद्र में थोड़ी दूर आगे विवेकानंद शिला है, जहाँ स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा है। कहते हैं स्वामी जी यहीं बैठकर चिंतन-मनन करते थे।

यातायात

कन्याकुमारी रेल तथा सड़क मार्ग से जुड़ा है। यह त्रिवेंद्रम से 80 किलोमीटर दूर है। यहाँ चेन्नई तथा त्रिवेंद्रम से रेल या बस से भी पहुँचा जा सकता है।

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