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हरियाली तीज व्रत कथा
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हरियाली तीज व्रत कथा

Hariyali Teej Fasting Story [ Vrat Katha ]

हरियाली तीज सावन मास का एक प्रमुख और अत्यंत मंगलकारी पर्व है, जिसे भगवान शिव और माता पार्वती के पावन मिलन तथा अखंड सौभाग्य के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आता है। वर्षा ऋतु में जब प्रकृति चारों ओर हरियाली से आच्छादित हो जाती है, तब यह उत्सव आनंद, समृद्धि, प्रेम और नवजीवन का संदेश देता है।

सनातन परंपरा में हरियाली तीज का विशेष महत्व है। विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना से यह व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएँ भगवान शिव जैसे आदर्श जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया व्रत परिवार में सुख, शांति और मंगल का कारण बनता है।

भारत के अनेक राज्यों जैसे राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, हरियाणा, दिल्ली और झारखंड में हरियाली तीज अत्यंत उत्साह के साथ मनाई जाती है। महिलाएँ हरे रंग के वस्त्र धारण करती हैं, मेहंदी लगाती हैं, झूला झूलती हैं, लोकगीत गाती हैं तथा भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करके अपने परिवार के कल्याण की प्रार्थना करती हैं।

हरियाली तीज का धार्मिक महत्व

हरियाली तीज केवल एक पर्व नहीं, बल्कि श्रद्धा, प्रेम, समर्पण और विश्वास का उत्सव है। सावन का महीना स्वयं भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना गया है। वर्षा ऋतु में प्रकृति का नवजीवन और हरियाली जीवन में नई ऊर्जा, आशा और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। इसी कारण इस तिथि को भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।

धार्मिक परंपरा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए अनेक वर्षों तक कठिन तपस्या की। उनकी अटूट श्रद्धा और दृढ़ संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। हरियाली तीज उसी दिव्य प्रेम, विश्वास और समर्पण का उत्सव है।

यह पर्व यह भी सिखाता है कि जीवन में धैर्य, संयम और सच्ची भक्ति से कठिन से कठिन लक्ष्य भी प्राप्त किया जा सकता है। भगवान शिव और माता पार्वती का आदर्श दाम्पत्य जीवन आज भी प्रेम, सम्मान और पारस्परिक विश्वास का सर्वोत्तम उदाहरण माना जाता है।

हरियाली तीज क्यों मनाई जाती है?

हरियाली तीज को लेकर विभिन्न क्षेत्रों में अनेक धार्मिक मान्यताएँ प्रचलित हैं। सबसे लोकप्रिय मान्यता के अनुसार यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का स्मरण कराता है। माता पार्वती ने अनेक वर्षों तक भगवान शिव की आराधना की और अंततः उनकी तपस्या सफल हुई। भगवान शिव ने उनकी निष्ठा और समर्पण से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाया।

सावन का महीना भगवान शिव की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इसी महीने में प्रकृति भी नई हरियाली से भर जाती है। इसलिए हरियाली तीज प्रकृति और अध्यात्म, दोनों के सुंदर संगम का प्रतीक है। यह पर्व हमें बताता है कि जिस प्रकार वर्षा से धरती में नया जीवन आता है, उसी प्रकार श्रद्धा और विश्वास से मनुष्य के जीवन में भी नई आशा और सकारात्मकता का संचार होता है।

हरियाली तीज व्रत कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हिमालयराज और माता मैना की पुत्री पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को अपना आराध्य मानती थीं। उनके मन में यह दृढ़ विश्वास था कि वे केवल भगवान शिव को ही अपने पति के रूप में स्वीकार करेंगी। जैसे-जैसे वे बड़ी हुईं, उनका यह संकल्प और भी मजबूत होता गया।

माता पार्वती ने सांसारिक सुख-सुविधाओं का त्याग करके भगवान शिव की आराधना आरंभ की। उन्होंने पर्वतों, वनों और एकांत स्थानों में कठोर तप किया। प्रारंभ में वे फल और कंद-मूल ग्रहण करती रहीं, फिर केवल पत्तों पर जीवन व्यतीत किया और अंततः अन्न एवं जल का भी त्याग कर दिया। उनकी तपस्या वर्षों तक निरंतर चलती रही।

प्रचंड गर्मी, वर्षा और कड़ाके की सर्दी भी उनकी साधना को विचलित नहीं कर सकी। उनका मन केवल भगवान शिव के ध्यान में लीन रहता था। वे प्रतिदिन शिव मंत्रों का जप करतीं और यही प्रार्थना करतीं कि उन्हें भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त हो।

माता पार्वती की इस कठिन तपस्या को देखकर देवता, ऋषि और सिद्धजन भी आश्चर्यचकित थे। सभी उनकी निष्ठा और धैर्य की प्रशंसा करते थे। दूसरी ओर उनके माता-पिता को अपनी पुत्री की कठिन साधना देखकर चिंता होती थी, परंतु वे जानते थे कि पार्वती का संकल्प अटल है।

समय बीतता गया और माता पार्वती की भक्ति और भी प्रगाढ़ होती गई। उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण भगवान शिव के ध्यान और आराधना को समर्पित कर दिया। उनके तप, संयम और त्याग ने तीनों लोकों को प्रभावित किया।

श्रावण मास के शुभ दिनों में माता पार्वती ने विशेष व्रत और पूजा का संकल्प लिया। उन्होंने भगवान शिव का ध्यान करते हुए पुष्प, जल और बिल्वपत्र अर्पित किए तथा पूर्ण श्रद्धा के साथ उनकी आराधना की। उनकी भक्ति इतनी निर्मल थी कि भगवान शिव स्वयं उनकी परीक्षा लेने के लिए एक तपस्वी के वेश में उनके सामने प्रकट हुए।

उस तपस्वी ने माता पार्वती से पूछा, “तुम इतनी कठोर तपस्या किस उद्देश्य से कर रही हो?” माता पार्वती ने अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया, “मैं भगवान शिव को ही अपना पति मान चुकी हूँ। मेरा संकल्प अटल है और मैं अपने आराध्य के अतिरिक्त किसी अन्य को स्वीकार नहीं कर सकती।”

तपस्वी ने भगवान शिव के विरक्त जीवन, उनके भस्म धारण करने, कैलाश में निवास करने और सरल जीवन का उल्लेख करते हुए माता पार्वती से अपना विचार बदलने को कहा। किंतु माता पार्वती अपने संकल्प से तनिक भी विचलित नहीं हुईं। उन्होंने कहा कि भगवान शिव ही उनके लिए सर्वोत्तम हैं और वे जीवनभर उनकी ही आराधना करेंगी।

माता पार्वती की अटूट श्रद्धा और अडिग विश्वास देखकर भगवान शिव अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “हे देवी! तुम्हारी भक्ति, धैर्य और समर्पण ने मुझे अत्यंत प्रसन्न किया है। तुम्हारा संकल्प सफल हुआ। मैं तुम्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करता हूँ।”

भगवान शिव के दर्शन पाकर माता पार्वती का हृदय आनंद से भर गया। देवताओं ने पुष्पवृष्टि की और चारों ओर मंगलध्वनि गूँज उठी। भगवान शिव ने माता पार्वती को आशीर्वाद दिया कि आने वाले युगों में जो भी स्त्री श्रद्धा और विश्वास के साथ उनका तथा माता पार्वती का पूजन करेगी, उसे सुखी दाम्पत्य जीवन, परिवार का मंगल और ईश्वर की कृपा प्राप्त होगी।

इसी दिव्य प्रसंग की स्मृति में श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व केवल एक व्रत नहीं, बल्कि अटूट विश्वास, प्रेम, समर्पण और भगवान शिव-माता पार्वती की कृपा का उत्सव है।

कथा से मिलने वाली शिक्षा

  • सच्ची श्रद्धा और दृढ़ संकल्प से भगवान की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।
  • धैर्य और संयम जीवन की सबसे बड़ी शक्तियाँ हैं।
  • सच्चा प्रेम विश्वास और सम्मान पर आधारित होता है।
  • भक्ति में निष्ठा और समर्पण का विशेष महत्व है।
  • भगवान शिव अपने भक्तों के निर्मल भाव से शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य मिलन

माता पार्वती की कठिन तपस्या, अटूट श्रद्धा और वर्षों के संयम से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने माता पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया और देवताओं की उपस्थिति में उनका दिव्य विवाह सम्पन्न हुआ। यह विवाह केवल दो दिव्य स्वरूपों का मिलन नहीं था, बल्कि शिव और शक्ति के शाश्वत एकत्व का प्रतीक माना जाता है। सनातन धर्म में शिव को चेतना तथा शक्ति को सृष्टि की ऊर्जा माना गया है। दोनों के मिलन से ही सृष्टि का संतुलन और संचालन संभव होता है।

धार्मिक मान्यता है कि सावन का महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। वर्षा ऋतु में जब प्रकृति नई ऊर्जा और हरियाली से भर जाती है, तब भगवान शिव और माता पार्वती का यह पावन मिलन जीवन में प्रेम, विश्वास और समृद्धि का संदेश देता है। इसी कारण हरियाली तीज को दाम्पत्य जीवन के सबसे शुभ पर्वों में से एक माना जाता है।

हरियाली तीज का आध्यात्मिक महत्व

हरियाली तीज केवल श्रृंगार या उत्सव का पर्व नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य मन, वचन और कर्म की पवित्रता के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करना है। यह पर्व हमें धैर्य, आत्मसंयम, प्रेम, त्याग और समर्पण जैसे गुणों को अपनाने की प्रेरणा देता है।

माता पार्वती का जीवन हमें सिखाता है कि यदि लक्ष्य पवित्र हो और विश्वास अडिग हो, तो कठिन परिस्थितियाँ भी सफलता का मार्ग बन जाती हैं। भगवान शिव का जीवन सादगी, वैराग्य, करुणा और समभाव का प्रतीक है। हरियाली तीज का व्रत इन दोनों आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संदेश देता है।

हरियाली तीज पर मेहंदी लगाने का महत्व

हरियाली तीज पर मेहंदी लगाना एक प्राचीन और शुभ परंपरा है। भारतीय संस्कृति में मेहंदी को सौभाग्य, प्रेम और मंगल का प्रतीक माना जाता है। इस दिन महिलाएँ हाथों और पैरों में सुंदर मेहंदी रचाती हैं तथा इसे माता पार्वती के आशीर्वाद का प्रतीक मानती हैं।

लोकमान्यता है कि जितनी गहरी मेहंदी का रंग होता है, उतना ही दाम्पत्य जीवन में प्रेम और सौहार्द बना रहता है। यद्यपि यह एक सांस्कृतिक विश्वास है, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य उत्सव के आनंद, पारिवारिक स्नेह और पारंपरिक रीति-रिवाजों को जीवित रखना है।

झूला झूलने की परंपरा

हरियाली तीज की सबसे सुंदर परंपराओं में झूला झूलना प्रमुख है। सावन के महीने में पेड़ों पर रंग-बिरंगे झूले सजाए जाते हैं। महिलाएँ और युवतियाँ समूह में झूला झूलती हैं, लोकगीत गाती हैं और इस पर्व का आनंद मनाती हैं।

झूला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जीवन में आनंद, संतुलन और उत्साह का प्रतीक भी माना जाता है। वर्षा ऋतु में प्रकृति के साथ जुड़ने और सामूहिक उत्सव मनाने की यह परंपरा भारतीय संस्कृति की सुंदर पहचान है।

सिंजारा का महत्व

राजस्थान, हरियाणा तथा उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में हरियाली तीज से पहले ‘सिंजारा’ मनाने की परंपरा है। इस अवसर पर विवाहित महिलाओं को उनके मायके से वस्त्र, श्रृंगार सामग्री, मिठाइयाँ, मेहंदी, चूड़ियाँ और उपहार भेजे जाते हैं।

सिंजारा केवल उपहार देने की परंपरा नहीं, बल्कि परिवारों के बीच प्रेम, सम्मान और आत्मीयता को मजबूत करने का माध्यम भी है। यह परंपरा मायके और ससुराल दोनों परिवारों के बीच स्नेह का प्रतीक मानी जाती है।

श्रृंगार का धार्मिक महत्व

हरियाली तीज पर महिलाएँ सोलह श्रृंगार करती हैं। हरे रंग की साड़ी या परिधान, हरी चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी और आभूषण धारण करना शुभ माना जाता है। हरा रंग प्रकृति, समृद्धि, नवजीवन और खुशहाली का प्रतीक है।

श्रृंगार का उद्देश्य केवल बाहरी सौंदर्य नहीं, बल्कि उत्सव की पवित्रता और मंगल भावना को प्रकट करना है। भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के समय महिलाएँ अपने जीवन में सुख, शांति और सौभाग्य की कामना करती हैं।

हरियाली तीज कैसे मनाई जाती है?

इस दिन प्रातःकाल स्नान करके महिलाएँ स्वच्छ और प्रायः हरे रंग के वस्त्र धारण करती हैं। भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। व्रत कथा का श्रवण किया जाता है, भजन-कीर्तन होते हैं तथा परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण किया जाता है।

अनेक स्थानों पर मंदिरों में विशेष श्रृंगार किया जाता है। भगवान शिव और माता पार्वती की झाँकियाँ निकाली जाती हैं। महिलाएँ समूह में पारंपरिक लोकगीत गाती हैं और सामूहिक रूप से पूजा करती हैं।

भारत के विभिन्न राज्यों में हरियाली तीज

राजस्थान में हरियाली तीज को अत्यंत भव्य रूप से मनाया जाता है। अनेक शहरों में माता पार्वती की शोभायात्राएँ निकाली जाती हैं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। जयपुर की हरियाली तीज यात्रा विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, हरियाणा और दिल्ली में भी महिलाएँ व्रत रखती हैं, मंदिरों में पूजा करती हैं और झूला झूलने की परंपरा निभाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सावन के लोकगीत और तीज के पारंपरिक उत्सव इस पर्व की सांस्कृतिक पहचान बने हुए हैं।

हरियाली तीज का सामाजिक महत्व

हरियाली तीज केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि परिवार और समाज को जोड़ने वाला उत्सव भी है। यह पर्व प्रेम, सम्मान, पारिवारिक एकता और सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है। महिलाएँ एक-दूसरे से मिलती हैं, शुभकामनाएँ देती हैं और समाज में सहयोग तथा सद्भाव की भावना को मजबूत करती हैं।

कथा से मिलने वाली प्रेरणा

  • जीवन में धैर्य और विश्वास कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
  • सच्ची भक्ति और समर्पण से ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।
  • दाम्पत्य जीवन का आधार प्रेम, सम्मान और विश्वास है।
  • परिवार और समाज के साथ मिलकर पर्व मनाने से संबंध मजबूत होते हैं।
  • प्रकृति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण भाग है।

हरियाली तीज हमें यह संदेश देती है कि जिस प्रकार वर्षा से धरती पर नई हरियाली आती है, उसी प्रकार श्रद्धा, प्रेम और सकारात्मक विचार हमारे जीवन में भी नई ऊर्जा और सुख का संचार कर सकते हैं। भगवान शिव और माता पार्वती का आदर्श जीवन आज भी प्रत्येक परिवार को प्रेम, धैर्य और समर्पण का मार्ग दिखाता है।

हरियाली तीज व्रत विधि

हरियाली तीज का व्रत श्रद्धा, संयम और भक्ति के साथ किया जाता है। इस दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ या हरे रंग के वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को साफ करके भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें और भगवान शिव तथा माता पार्वती का ध्यान करें।

पूजा के समय भगवान शिव का जल, गंगाजल तथा पंचामृत से अभिषेक करें। इसके बाद चंदन, अक्षत, बिल्वपत्र, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और फल अर्पित करें। माता पार्वती को सुहाग की सामग्री जैसे चुनरी, चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर और श्रृंगार सामग्री अर्पित करना शुभ माना जाता है। पूजा के बाद हरियाली तीज व्रत कथा का श्रवण करें और भगवान शिव एवं माता पार्वती की आरती करें।

यदि स्वास्थ्य अनुमति दे तो दिनभर उपवास रखें। कुछ श्रद्धालु निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ फलाहार या सात्त्विक आहार ग्रहण करते हैं। अपनी स्वास्थ्य स्थिति और पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत का पालन करना उचित है।

हरियाली तीज पूजा सामग्री

  • भगवान शिव, माता पार्वती एवं भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र
  • गंगाजल या शुद्ध जल
  • पंचामृत
  • बिल्वपत्र
  • चंदन
  • अक्षत (चावल)
  • धूप एवं दीप
  • कपूर
  • ताजे पुष्प एवं पुष्पमाला
  • मौसमी फल
  • मिठाई या नैवेद्य
  • नारियल
  • पान, सुपारी और लौंग
  • रोली और मौली
  • श्रृंगार सामग्री (चूड़ियाँ, मेहंदी, सिंदूर, बिंदी, चुनरी)

हरियाली तीज पर कौन-से मंत्र का जप करें?

पूजा के समय भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र “ॐ नमः शिवाय” का श्रद्धापूर्वक जप करें। इसके अतिरिक्त महामृत्युंजय मंत्र का जप भी शुभ माना जाता है। माता पार्वती का ध्यान करते हुए उनके प्रति प्रार्थना करें कि वे परिवार में प्रेम, सुख, शांति और सौभाग्य बनाए रखें।

हरियाली तीज व्रत के नियम

  • व्रत के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ एवं सात्त्विक वस्त्र धारण करें।
  • क्रोध, असत्य, कटु वचन और विवाद से दूर रहें।
  • सात्त्विक भोजन करें या अपनी क्षमता के अनुसार उपवास रखें।
  • भगवान शिव एवं माता पार्वती का ध्यान, जप और पूजा करें।
  • जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता और यथाशक्ति दान करें।
  • व्रत कथा का श्रवण अवश्य करें।
  • परिवार के सभी सदस्यों के मंगल और सुख की प्रार्थना करें।
  • प्रकृति और पर्यावरण के प्रति सम्मान की भावना रखें।

हरियाली तीज व्रत का पारण

अगले दिन प्रातः स्नान करने के बाद भगवान शिव और माता पार्वती की पुनः पूजा करें। उन्हें नैवेद्य अर्पित करें और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। इसके बाद प्रसाद ग्रहण करके तथा सात्त्विक भोजन के साथ व्रत का पारण करें। कई स्थानों पर व्रत पूर्ण होने के बाद दान-दक्षिणा देना भी शुभ माना जाता है।

हरियाली तीज व्रत का फल

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया हरियाली तीज व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त कराने वाला माना जाता है। यह व्रत दाम्पत्य जीवन में प्रेम, विश्वास और सौहार्द बढ़ाने की प्रेरणा देता है तथा परिवार में सुख, शांति और मंगल की भावना को मजबूत करता है।

  • भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
  • दाम्पत्य जीवन में प्रेम और विश्वास बढ़ता है।
  • परिवार में सुख, शांति और समृद्धि की मंगलकामना की जाती है।
  • अविवाहित कन्याएँ योग्य जीवनसाथी की कामना से यह व्रत करती हैं।
  • मन में सकारात्मकता, धैर्य और आध्यात्मिक विश्वास का विकास होता है।

निष्कर्ष

हरियाली तीज केवल एक पारंपरिक पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, श्रद्धा, धैर्य और समर्पण का उत्सव है। माता पार्वती की अटूट भक्ति और भगवान शिव की करुणा हमें यह सिखाती है कि सच्ची निष्ठा और विश्वास से जीवन के कठिन मार्ग भी सरल हो सकते हैं। यह पर्व परिवार, समाज और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने का भी संदेश देता है। इसलिए हरियाली तीज को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और आध्यात्मिक जीवन के उत्सव के रूप में मनाना चाहिए।

हरियाली तीज का व्रत किसके लिए रखा जाता है?
हरियाली तीज का व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए रखा जाता है। विवाहित महिलाएँ अखंड सौभाग्य तथा अविवाहित कन्याएँ योग्य जीवनसाथी की कामना से यह व्रत करती हैं।
हरियाली तीज कब मनाई जाती है?
हरियाली तीज श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। यह सावन मास का प्रमुख पर्व है।
हरियाली तीज का धार्मिक महत्व क्या है?
हरियाली तीज भगवान शिव और माता पार्वती के पावन मिलन, अखंड सौभाग्य तथा सुखी दाम्पत्य जीवन का प्रतीक मानी जाती है।
हरियाली तीज पर किन देवी-देवताओं की पूजा की जाती है?
हरियाली तीज पर भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा की जाती है।
क्या अविवाहित कन्याएँ हरियाली तीज का व्रत रख सकती हैं?
हाँ, अविवाहित कन्याएँ भगवान शिव जैसे आदर्श जीवनसाथी की कामना से श्रद्धापूर्वक यह व्रत रख सकती हैं।
हरियाली तीज पर कौन-सा मंत्र जपना चाहिए?
'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जप विशेष शुभ माना जाता है। श्रद्धालु महामृत्युंजय मंत्र का जप भी कर सकते हैं।
हरियाली तीज व्रत में क्या नियम रखने चाहिए?
सात्त्विक जीवनचर्या अपनाएँ, भगवान शिव-पार्वती की पूजा करें, व्रत कथा सुनें तथा क्रोध और असत्य से दूर रहें।
हरियाली तीज व्रत का पारण कैसे किया जाता है?
अगले दिन पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण कर सात्त्विक भोजन से व्रत का पारण किया जाता है।
हरियाली तीज पर मेहंदी लगाने का क्या महत्व है?
मेहंदी शुभता, प्रेम, सौभाग्य और तीज के पारंपरिक श्रृंगार का प्रतीक मानी जाती है।
हरियाली तीज व्रत का क्या फल मिलता है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा, सुखी दाम्पत्य जीवन, सौभाग्य और परिवार में सुख-शांति प्रदान करता है।
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