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हरियाली अमावस्या

Hariyali Amavasya

हरियाली अमावस्या श्रावण मास की अमावस्या को कहा जाता है। वर्षा ऋतु में प्रकृति हरी-भरी हो जाती है, इसलिए इस तिथि को हरियाली अमावस्या नाम मिला। इसे श्रावणी अमावस्या भी कहते हैं। यह दिन भगवान शिव की आराधना, पितृ-स्मरण, वृक्षारोपण और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने से जुड़ा है।

उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में मंदिरों में विशेष दर्शन और मेलों की परंपरा है। किसान कृषि-उपकरणों का सम्मान करते हैं और लोग पीपल, बरगद, नीम, आँवला तथा स्थानीय जलवायु के अनुकूल वृक्ष लगाते हैं।

हरियाली अमावस्या का धार्मिक महत्व

श्रावण भगवान शिव की उपासना का पवित्र मास माना जाता है। इसलिए हरियाली अमावस्या पर शिवलिंग का जलाभिषेक, मंत्र-जप और दान विशेष रूप से प्रचलित हैं। अमावस्या होने के कारण पितरों का स्मरण भी किया जाता है। वृक्ष लगाना केवल पूजा का प्रतीक नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों और जीव-जगत के प्रति उत्तरदायित्व का कार्य है।

हरियाली अमावस्या की लोकप्रचलित व्रत कथा

एक समय एक राजा अपने परिवार के साथ महल में सुखपूर्वक रहता था। उसके पुत्र का विवाह हो चुका था और पुत्रवधू भी उसी महल में रहती थी। एक दिन पुत्रवधू ने रसोई में रखी मिठाइयाँ देखीं। लोभवश उसने सारी मिठाई खा ली। जब परिवार ने पूछा कि मिठाई कहाँ गई, तो उसने अपनी भूल स्वीकार करने के बजाय कहा कि मिठाई चूहों ने खा ली।

महल के चूहों ने यह झूठा आरोप सुन लिया। वे क्रोधित हुए और पुत्रवधू को उसकी असत्य बात का परिणाम समझाने का निश्चय किया। कुछ दिनों बाद महल में अतिथि आए। अवसर देखकर चूहों ने पुत्रवधू की साड़ी उसके कक्ष से उठाकर अतिथि के कमरे में रख दी।

अगली सुबह जब साड़ी अतिथि के कमरे में मिली, तो लोगों ने बिना सत्य जाने पुत्रवधू के चरित्र पर संदेह करना आरंभ कर दिया। बात राजा तक पहुँची। राजा ने भी पूरी जाँच किए बिना पुत्रवधू को दोषी मान लिया और उसे महल से निकाल दिया।

पुत्रवधू एक छोटी झोपड़ी में रहने लगी। अपने दुःख के बीच उसने भगवान पर विश्वास बनाए रखा। वह प्रतिदिन पीपल-वृक्ष के नीचे दीपक जलाती, श्रद्धा से पूजा करती, गुड़धानी का भोग लगाती और प्रसाद लोगों में बाँटती। उसने अपनी कठिन परिस्थिति में भी सेवा, संयम और भक्ति नहीं छोड़ी।

एक दिन राजा उस पीपल-वृक्ष के पास से गुजरा। उसने वृक्ष के चारों ओर अनेक दीपों का प्रकाश देखा और आश्चर्यचकित हो गया। महल लौटकर उसने सैनिकों से उस प्रकाश का रहस्य जानने को कहा। सैनिक वृक्ष के निकट पहुँचे और लोककथा के अनुसार उन्होंने दीपकों को आपस में अपनी-अपनी कथा कहते सुना।

उनमें से एक दीप ने कहा कि राजा की पुत्रवधू प्रतिदिन उसे जलाती है। दूसरे दीपों ने पूछा कि वह महल से बाहर क्यों रहती है। तब उस दीप ने पूरा सत्य बताया—पुत्रवधू ने मिठाई स्वयं खाकर चूहों पर झूठा दोष लगाया था; चूहों ने बदला लेने के लिए उसकी साड़ी अतिथि के कमरे में रखी और राजा ने बिना जाँच उसे महल से निकाल दिया।

सैनिकों ने यह बात राजा को बताई। राजा को अपने निर्णय पर पश्चात्ताप हुआ। उसने सत्य की जाँच कर पुत्रवधू को सम्मानपूर्वक वापस बुलाया। पुत्रवधू ने भी अपनी प्रारंभिक भूल और असत्य स्वीकार किया। परिवार में फिर से शांति स्थापित हुई।

यह लोकप्रचलित कथा बताती है कि एक असत्य अनेक कठिनाइयों को जन्म दे सकता है और बिना जाँच किसी पर आरोप लगाना भी अनुचित है। साथ ही, कठिन समय में धैर्य, भक्ति, सेवा और सत्य स्वीकार करने का साहस अंततः जीवन को सही दिशा देता है।

॥ हरियाली अमावस्या व्रत कथा सम्पूर्ण ॥

हरियाली अमावस्या पूजा सामग्री

  • भगवान शिव और माता पार्वती का चित्र अथवा शिवलिंग
  • शुद्ध जल, गंगाजल और बिल्वपत्र
  • चंदन, अक्षत और पुष्प
  • धूप, दीप, कपूर और सात्त्विक नैवेद्य
  • रोपण के लिए स्थानीय प्रजाति का स्वस्थ पौधा
  • पौधे की सुरक्षा के लिए खाद, जल और ट्री-गार्ड
  • दान के लिए अन्न, फल या वस्त्र

हरियाली अमावस्या की सरल पूजा विधि

  • प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और शिव पूजा, पितृ-स्मरण तथा वृक्ष-सेवा का संकल्प लें।
  • भगवान शिव का जलाभिषेक करें। बिल्वपत्र, चंदन, अक्षत और पुष्प अर्पित करके ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करें।
  • अपने ज्ञात-अज्ञात पितरों को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करें। औपचारिक तर्पण कुल-परंपरा के अनुसार करें।
  • स्थानीय जलवायु के अनुकूल पौधा उचित स्थान पर लगाएँ। किसी सार्वजनिक स्थान पर पौधा लगाने से पहले अनुमति लें।
  • पौधे को जल दें, सुरक्षा की व्यवस्था करें और नियमित देखभाल का संकल्प लें। केवल रोपण करके छोड़ना पर्याप्त नहीं है।
  • पीपल या अन्य स्थापित वृक्ष की पूजा करें तो जड़ में आवश्यकता भर जल दें और कोई प्लास्टिक, कपड़ा या कचरा न छोड़ें।
  • हरियाली अमावस्या की कथा पढ़ें, शिव आरती करें और प्रकृति तथा परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।
  • जरूरतमंद को अन्न, फल, वस्त्र या यथाशक्ति सहायता दें।

हरियाली अमावस्या मंत्र

ॐ नमः शिवाय।

ॐ सर्वेभ्यो पितृभ्यो नमः।

हरियाली अमावस्या के नियम

  • पौधा वही लगाएँ जिसकी नियमित देखभाल की जा सके।
  • स्थानीय और पर्यावरण के अनुकूल वृक्ष-प्रजाति को प्राथमिकता दें।
  • जीवित वृक्ष पर कील, प्लास्टिक, तार या हानिकारक सामग्री न लगाएँ।
  • मांसाहार, मदिरा, असत्य, निंदा और क्रोध से बचें।
  • जल-स्रोतों और पूजा-स्थलों को स्वच्छ रखें।
  • उपवास स्वास्थ्य और क्षमता के अनुसार रखें।

हरियाली अमावस्या से संबंधित सामान्य प्रश्न

हरियाली अमावस्या कब मनाई जाती है?
श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को हरियाली अमावस्या कहा जाता है। इसे श्रावणी अमावस्या भी कहते हैं। सही तिथि स्थानीय पंचांग से देखनी चाहिए।
हरियाली अमावस्या पर किसकी पूजा की जाती है?
इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा, पितरों का स्मरण तथा वृक्षों की सेवा की जाती है। विभिन्न क्षेत्रों में भगवान कृष्ण के विशेष दर्शन की परंपरा भी मिलती है।
हरियाली अमावस्या पर वृक्ष क्यों लगाए जाते हैं?
वर्षा ऋतु पौधारोपण के लिए अनुकूल होती है और यह पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता से जुड़ा है। वृक्ष लगाना पर्यावरण, जीव-जगत और आने वाली पीढ़ियों की सेवा का संकल्प माना जाता है।
हरियाली अमावस्या की कथा किस विषय पर है?
लोकप्रचलित कथा राजा की पुत्रवधू, मिठाई, चूहों के झूठे आरोप, पीपल के नीचे दीप-पूजा और सत्य सामने आने से संबंधित है। कथा सत्य, धैर्य और बिना जाँच आरोप न लगाने का संदेश देती है।
हरियाली अमावस्या पर कौन-सा पौधा लगाना चाहिए?
पीपल, बरगद, नीम, आँवला या अपने क्षेत्र की स्थानीय और अनुकूल प्रजाति का पौधा लगाया जा सकता है। स्थान, अनुमति और पौधे की नियमित देखभाल की व्यवस्था पहले सुनिश्चित करें।
क्या हरियाली अमावस्या पर व्रत रखना अनिवार्य है?
व्रत रखना अनिवार्य नहीं है। श्रद्धालु शिव पूजा, मंत्र-जप, पितृ-स्मरण, वृक्षारोपण, सेवा और दान के माध्यम से भी इस दिन की आराधना कर सकते हैं।
हरियाली अमावस्या पर क्या दान करना चाहिए?
अन्न, फल, वस्त्र, पौधे, बीज या जरूरत की वस्तुएँ यथाशक्ति दान की जा सकती हैं। पौधा तभी दें जब उसे लगाने और संभालने की व्यवस्था हो।
क्या पौधा लगाना ही पर्याप्त है?
नहीं, पौधे को नियमित जल, खाद, सुरक्षा और देखभाल देना आवश्यक है। हरियाली अमावस्या का वास्तविक संदेश वृक्ष लगाने के साथ उसे जीवित और सुरक्षित रखना भी है।

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