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पापांकुशा एकादशी व्रत कथा

पापांकुशा एकादशी व्रत कथा

वह परम पिता चाहता है कि हम दुनियां की मोह माया से मुक्त हो कर आत्म को परमात्मा मे निरूपित कर दे. आत्मा का परमात्मा से मेल ही जीवात्मा का परम लक्ष्य है. इस लक्ष्य की दिया में हमें सांसारिक मोह, माया के चक्रव्यूह को तोड़कर मन, इन्द्रियो को काबू में रखना होगा और कठिन तपस्या करना होगा.

आपने सुना होगा कि प्राचीन काल में ऋषि मुनि हुआ करते थे जो मोक्ष प्राप्ति के उद्देश्य से घने वनो और पहाड़ियों पर कई वर्षों तक कठोर तपस्या किया करते थे. वह सतयुग का समय था जब ऐसा संभव था लेकिन इस समय कलिकाल यानी कलयुग चल रहा है जहां चारों तरफ काम, वासना, लोभ और मोह का राज चल रहा है. इस युग में अगर सतयुग की तरह कठिन तपस्या करना हो तो आत्मा की मुक्ति मुश्किल हैं क्योंकि मनुष्य शरीर प्राप्त करके हम सुख और कामनाओं की पूर्ति में इस तरह डूब जाते हैं कि भूल ही जाते हैं कि यह मानव शरीर प्रभु ने क्यों दिया है हमें. मानव शरीर क्यो मिला है हमें यह एहसास हमें तब होता है जब जीवन की सांझ ढ़लने लगती है और तब याद आता है कि हमने अपनी मुक्ति का उपाय क्यों नहीं किया. इस स्थिति में एक भजन है

जो इस स्थिति में मन की भावना को उजागर करता है वह यहां उल्लेख करना चाहूंगा ” मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वारा तुम्हारे आŠৠँ”.

कलियुग में मनुष्य को पाप से बचाने और मोक्ष का रास्ता आसान बनाने हेतु दयालु ईश्वर ने कई साधन बताये हैं. इन्हीं में से है एकादशी व्रत. एकादशी हर महीने में दो बार यानी साल में 24 बार आती है विशेष मास में आने वाली दो एकादशी को जोड़ कर कुल 26 एकादशी होती हैं.

यहां हम पाप पर अंकुश अर्थात नियंत्रण रखने वाले एकादशी पापांकुशा एकादशी की कथा और महातम्य पर बात कर रहे हैं.

पापांकुशा एकादशी का व्रत आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है . ब्रह्माण्ड पुराण में एकादशी के विषय में काफी विस्तार से बताया गया है. आइये हम आप इस व्रत की कथा का आनन्द लें और इसके पुण्य लाभ को जानें. इस व्रत में भगवान वासुदेव अर्थात श्रीविष्णु की पूजा का विधान है. कथानुसार एक बार घर्मराज ने श्री कृष्ण से पूछा कि आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या महत्व है और इस अवसर पर किसकी पूजा होती है एवं इस व्रत का क्या लाभ है.

युधिष्ठर की मधुर वाणी को सुनकर गुणातीत श्री कृष्ण भगवान बोले आश्विन शुक्ल एकादशी पापांकुश के नाम से जानी जाती है.

नाम से ही स्पष्ट है कि यह पाप का निरोध करती है अर्थात उनसे रक्षा करती है. इस एकादशी के व्रत से मनुष्य को अर्थ, मोक्ष और काम इन तीनों की प्राप्ति होती है.

जो व्यक्ति यह व्रत करता है उसके सारे संचित पाप नष्ट हो जाते हैं. इस दिन व्रती को सुबह स्नान करके विष्णु भगवान का ध्यान करना चाहिए और उनके नाम से व्रत और पूजन करना चाहिए. व्रती को रात्रि में जागरण करना चाहिए. जो भक्ति पूर्वक इस व्रत का पालन करते हैं उनका जीवन सुखमय होता है और वह भोगों मे लिप्त नहीं होता. श्री कृष्ण कहते हैं जो इस पापांकुश एकदशी का व्रत रखते हैं वे भक्त कमल के समान होते हैं

जो संसार रूपी माया के पंक में भी पाप से अछूता रहते है.

कलिकाल में जो भक्त इस व्रत का पालन करते हैं उन्हें वही पुण्य प्राप्त होता है जो सतयुग में कठोर तपस्या करने वाले ऋषियों को मिला करते हैं.

इस एकादशी व्रत का जो व्यक्ति शास्त्रोक्त विधि से अनुष्ठान करते हैं वे न केवल अपने लिए पुण्य संचय करते हैं बल्कि उनके पुण्य से मातृगण व पितृगण भी पाप मुक्त हो जाते हैं. इस एकादशी का व्रत करके व्रती को द्वादशी के दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन करना चाहिए और अपनी क्षमता के अनुसार उन्हें दान देना चाहिए.

पापांकुशा एकादशी व्रत पूजा विधि

पापांकुशा एकादशी व्रत की कथा अनुसार विन्ध्यपर्वत पर महा क्रुर और अत्यधिक क्रोधन नामक एक बहेलिया रहता था. जीवन के अंतिम समय पर यमराज ने उसे अपने दरबार में लाने की आज्ञा दी. दूतोण ने यह बात उसे समय से पूर्व ही बता दी. मृत्युभय से डरकर वह अंगिरा ऋषि के आश्रम में गया और यमलोक में जाना न पडे इसकी विनती करने लगा. अंगिरा ऋषि ने उसे आश्चिन मास कि शुक्ल पक्ष कि एकादशी के दिन श्री विष्णु जी का पूजन करने की सलाह देते हैं. इस एकादशी का पूजन और व्रत करने से वह अपने सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को गया.

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